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जघन्य अपराध  का दमन जघन्यतम अपराध से ही क्या जरूरी?
December 6, 2019 • सह संपादक मुकेश मिश्र • स्वतंत्र विचार

 

 

डा0 भीमराव अम्बेडकर की 64 वीं पुण्यतिथि पर दम तोड़ता भारतीय संविधान ?

कोई भी व्यक्ति अपराध जानबूझ कर नहीं करता वरन् उसके अपराधी कार्य के पीछे कोई न कोई कारण ऐसा होता है जिसके वशीभूत हो यह गलत कार्यों अथवा अपराधिक कार्यो की ओर अग्रसर होता है ।

कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि वह अपराध कर अपराधी बने और समाज उसे तिरस्कृत नजरों से देखे । हमारी विद्यमान सामाजिक, कानूनी, आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ ही ऐसी हैं जो व्यक्ति को अपराधी बनने हेतु मजबूर करती हैं ।
अपराध वास्तव में क्या है ? इस सम्बंध में अनेक लोगों ने अपराध की परिभाषा अपने-अपने दृष्टिकोणों से दे रहे है । 
यहां तक कि कुछ लोग  गैर-कानूनी एवं सामाजिक शब्दों में अपराध को परिभाषित भी कर चुके हैं 

आज हैदराबाद की घटना से बहस शुरू हो गई है और लोग इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं कि महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर इससे भारत की साख और संविधान  पर क्या असर पड़ेगा?
लेकिन यौन अपराध एक मानसिक बीमारी भी है. ऐसे में क्या भारत के मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक
-2013 में मनोविकृत यौनअपराधियो के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं ।
जबकि यौन घटना दुनिया के सभी संस्कृतियों में है, तो क्या अब समय आ गया है कि भारत की संस्कृति में 
इसके लिए कठोर कानून बनाने जिससे हमारी न्यायपालिका में लोगों का भरोसा क़ायम रहे ।  

 

बलात्कार करने वाले व्यक्ति की हिंसा को ड्रग और अल्कोहल के ख़राब असर के संदर्भ में भी देखे जाने की ज़रू़रत है बलात्कारी के 'असामाजिक व्यवहार की समस्या' की पड़ताल करने की महज़ चर्चा की ही जरूरत नहीं अपितु उस पर संगठनों को आगे आकर अब काम करने की जरूरत भी आ पड़ी हैं,
और चिंताजनक रूप से किशोर बलात्कारी को समाज में फिर से लौटने दे दिया जाएगा। ऐसे में उसके फिर से अपराध करने के खतरे को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है। उस पर विचार करना होगा
इसमें कोई शक़ नहीं कि समाज की सोच में बदलाव से हालात बदलेंगे लेकिन ऐसा होने में कई दशक गुज़र सकते हैं
इस बात को लेकर गहरी फिक्र भारतीय समाज में होती है कि भारत में आज यौन अपराधियों से निपटने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली के अलावा किसी और ज़रिए की गुंजाइश बहुत कम ही है, जैसा हैदराबाद मामले में आज हुआ,
जहां ऐसे दूसरे उपाय हैं वहाँ भी ऐसा कोई कानूनी उपाय नहीं है जिससे अपराध करने वाले व्यक्ति को दिमागी इलाज या अन्य किसी तरह से सहायता लेने के लिए बाध्य किया जा सके।
आज हैदराबाद की इस घटना से यह सवाल तो उठता ही है कि केवल जेल भेज देने भर से या जघन्य अपराध को जघन्यतम अपराध से ही उसका दमन किया जाए। इस तरह खुलें तौर पर संविधान में छूट दे देने से समाज को यौन अपराधियों से किस तरह से सुरक्षित बनाया जा सकता है।
इस तरह के किसी विशेष पुनर्वास कार्यक्रम के अभाव में अपराध फिर से करने के मामले और इसके दोबारा साबित होने की दर पहले से ज्यादा बनी रहती है  ख़ासकर रिहा होने के पहले साल में, जैसा कि उन्नाव में देखने-सुनने को मिला । यौन 
अपराधियों के पुनर्वास से जुड़े कार्यक्रम में उनके ख़तरे, जरूरत और प्रतिक्रिया के सिद्धांतों का ख्याल रखा जाता है। इससे फिर से अपराध करने के मामलों में बड़े पैमानों पर कमी होती  है।
किशोर अपराधियों और खतरे की अधिक संभावना वाले अपराधियों के मामले में भी दिमागी इलाज का बेहतर असर देखा गया।
मौजूदा स्वरूप में इस कानून से बहुत कम उम्मीद है कि समाज में यौन अपराधियों के खतरे का निदान निकल पाएगा।समस्या के समुचित मूल्यांकन को नज़रअंदाज करने से कानून बनाने वालों और इसे लागू करने वालों के लिए जोखिम की स्थिति बन गई है।
और आज की तरह बाई पास करके सजा सुनाना भारतीय संविधान की शाख पर भी आंच आएगी।
मौजूदा स्वरूप में इस भारतीय कानून से यौन अपराधियों पर कोई लगाम लगने की संभावना कम ही है ?
वस्तुत: समाज से इस समस्या को समाप्त करने हेतु अनेंक उपाय किये गए हैं किन्तु इसमें सन्देह ही है कि वास्तव में अपराध खत्म हो सकता है । अत: आज आवश्यकता इस बात की है कि जो भी उपाय व्यवस्था द्वारा अपनाये गये हैं उन्हें कारगर ढंग से लागू किया जाये, कठोरता से अपनाया जाये । वर्तमान में कई संस्थाएँ भी इस ओर अग्रसर हैं ।...?

मुकेश मिश्र सह संपादक