ALL प्रमुख खबर राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय राज्य , शहर खेल आर्थिक मनोरंजन स्वतंत्र विचार अन्य
भोपाल गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले एक्टिविस्ट अब्दुल जब्बार को मरणोपरांत साथ ही जगदीश आहूजा को पद्मश्री सम्मान
January 25, 2020 • एस पी एन न्यूज़ डेस्क • राष्ट्रीय


नई दिल्ली (स्वतंत्र प्रयाग)- गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है।  इस साल पद्म श्री पुरस्कार के लिए 21 हस्तियों का चयन किया गया है। पद्म श्री भारत का चौथा सर्वोच्च सम्मान है।

जिन लोगों को सम्मानित करने के लिए चुना गया है, इनमें भोपाल गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले एक्टिविस्ट अब्दुल जब्बार व लंगर बाबा जगदीश लाल आहूजा, सामाजिक कार्यकर्ता जावेद अहमद टेक, सामाजिक कार्यकर्ता सत्यनारायण मुनडयूर, सामाजिक कार्यकर्ता एस रामकृष्ण, सामाजिक कार्यकर्ता योगी एरोन, मुन्ना मास्टर, सत्यनारायण मुनड्यूर,  कुशल कोनवार शर्मा, त्रिनिती सावो, रविकन्नन, एस रामकृष्णन, सुंदरम वर्मा,  और तुलसी गोवडा के नाम शामिल हैं।

भोपाल गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले एक्टिविस्ट अब्दुल जब्बार को मरणोपरांत पद्म श्री से सम्मानित किया जाएगा। अब्दुल जब्बार का बीते साल, 14 नवंबर 2019 को इंतकाल हो गया था। इन लोगों के अलावा जिन लोगों को चुना गया है, उनमें- उषा, पोपटराव पवार, हरेकाला हजब्बा, अरुणोदय मंडल, राधामोहन और साबरमती, कुशल कोनवार शर्मा, त्रिनिती सावो, रविकन्नन, एस रामकृष्णन, सुंदरम वर्मा, मुन्ना मास्टर, योगी आर्यन, राहीबाई सोमा पोपेरा, हिम्मत राम भांभू, मोझ्झिकल पंकजाक्षी।
 

पद्म श्री पुरस्कार1984 भोपाल गैस त्रासदी के कार्यकर्ता अब्दुल जब्बार को मरणोपरांत पद्म श्री से सम्मानित किया गया। 14 नवंबर 2019 को उनका निधन हो गया। जगदीश आहूजा को लंगर के लिए जाना जाता है। लोग इन्हें प्यार से लंगर बाबा के नाम से भी बुलाते हैं।

वह रोजाना पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ में गरीब मरीजों और उनके तीमारदारों को फ्री में भोजन मुहैया कराते हैं। साथ ही मरीजों को आर्थिक सहायता से लेकर कंबल और कपड़े तक अन्य सहायता मुहैया कराते हैं। उन्होंने 1980 के दशक में मुफ्त भोजन परोसना शुरू कर दिया था।

वह 2000 में PGIMER चल आए थे और वहीं 15 सालों तक रोजाना 2,000 से अधिक लोगों की सेवा कर रहे हैं। मोहम्मद शरीफ को चाचा शरीफ भी कहा जाता है। इन्होंने पिछले 25 सालों में फैजाबाद और उसके आस-पास 25,000 से ज्यादा लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। इन्होंने कभी भी धर्म के आधार पर अंतर नहीं किया, बल्कि व्यक्ति के धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अंतिम करते रहे हैं।