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 आखिर क्या कारण है कि एक अपराधी विकाश दुबे के पुलिस एनकाउंटर मामले में....?
July 13, 2020 • एस पी एन न्यूज़ डेस्क • स्वतंत्र विचार

प्रयागराज, (स्वतंत्र प्रयाग), आखिर क्या कारण है कि एक अपराधी विकास दुबे के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने के बाद सोशल मीडिया पर ब्राह्मण समाज का एक बड़ा हिस्सा गुस्से में है - ऐसा प्रतीत हो रहा है - मै भी इस पर विचार कर रहा हूं और इसकी तह में जाने की बौद्धिक कोशिश कर रहा हूं ।

जो ब्राह्मण समाज सर्वे भवन्तु सुखिन का मंत्र जपता हो,जो ब्राह्मण समाज वसुधैव कुटुंबकम् की भावना का पोषक हो और जो ब्राह्मण समाज प्राणियों में सदभावना हो विश्व का कल्याण हो का नारा गढ़ता हो क्या वास्तव में वहीं ब्राह्मण समाज एक अपराधी के मारे जाने पर गुस्से में है ?

मुझे लगता है ऐसा नहीं है,फिर सवाल उठता है कि यह गुस्सा प्रतीत क्यों हो रहा है। मेरा विवेक उत्तर देता है कि यह गुस्सा विकास के मारे जाने का नहीं बल्कि सर्व दलीय व सर्व कालिक, सत्ता शासन व नीति नियंताओं द्वारा अपारदर्शी पक्षपातपूर्ण रवैए व ब्राह्मण समाज के सरोकारों की उपेक्षा से उपजी पीड़ा का है।

वर्तमान सहित सर्वकालिक शासन सत्ता व राजनीति ने अपनी कार्य शैली से कई सवालों को जन्म दिया है जिनका मै जिक्र करना चाहूंगा ।

      जब देश के सभी एकमत राजनीतिक दल व देश के नीति नियंता दलित पिछड़ों को आगे बढ़ने का अवसर देने के लिए जो की उचित भी है आरक्षण की नीति बनाते हैं,तो आखिर यह विचार क्यों नहीं करते हैं कि उक्त आरक्षण के कारण अगर कोई प्रतिभाशाली जरूरतमंद गैर आरक्षित नौजवान वंचित होता है तो उसके अधिकारों व प्रतिभा की रक्षा के लिए भी कोई प्रभावी योजना होनी चाहिए।

आरक्षण का कटु सत्य तो यह यह है कि तमाम पिछड़ी जातियां ब्राह्मण से हर दृष्टि से संपन्न हैं।जब देश के सभी एकमत राजनीतिक दल व नीति नियंता दलितों के लिए एससी/एसटी एक्ट को संविधान की 9 वीं अनुसूची में डालते हैं तो यह क्यों नहीं सोच पाते कि इसका दुरुपयोग होगा,जो कि हो रहा है।

तो उसका निदान या समाधान क्या होगा।जब सभी मानते हैं कि मानवता पहले है जाति बाद में तब देश की राजनीति व नीति नियंता अन्य जातियों वर्गों के किसी व्यक्ति की निंदनीय हत्या पर जितने संवेदनशील नजर आते हैं,उतने संवेदन शील देश व प्रदेश में ब्राह्मणों की निरंतर हो रही सामूहिक हत्याओं पर भी क्यों नजर नहीं आते ? ब्राह्मणों की हत्याओं पर उदासीन क्यों रहते हैं ।

अन्य जातियों वर्गों की भांति सवर्ण आयोग की जरूरत इस देश की राजनीति क्यों नहीं महसूस करती इसमें हर्ज और दिक्कत क्या है ?

जब सरकारें तमाम जातियों वर्गों की मानवीय मदद के लिए शिक्षा शुल्क, प्रवेश शुल्क,परीक्षा शुल्क,यात्रा शुल्क,हास्टल शुल्क,इलाज शुल्क आदि में जरूरी व उचित सहायता का प्राविधान करती हैं तो यह क्यों नहीं सोच पाती कि सवर्णों व ब्राह्मणों में भी ऐसे लोग हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं नसीब होती,उनकी सहायता क्यों नहीं ?

आज के राजनीतिक दलों की सोच भी विध्वंस व विभाजनकारी है,अगर किसी पार्टी में ब्राह्मण कार्यकर्ता अधिक हैं और वास्तव में पार्टी की नींव रखने वाले हैं फिर भी मंच पर उनकी संख्या अधिक हो जाय तो दल के बड़े नेता यहां तक की ब्राह्मण नेता भी सहन नहीं कर पाते और सार्वजनिक आपत्ति करते हैं,सब एक ही जाति के लोग मंच पर बैठ गए,पदों के बंटवारे में भी संख्या अधिक न हो इसका प्रतिबन्ध लगा रखा है।

अमूमन दलों में ब्राह्मणों के लिए स्थान ही नहीं बचा, किसी को प्रतिनिधित्व के लिए रखा भी तो निर्णय का अधिकार नहीं है।

        जब विकास दुबे के एनकाउंटर पर ब्राह्मणों के गुस्से को समझना हो तो उसके पीछे के कारणों के उपरोक्त कारणों के साथ यह भी विचार करना होगा कि क्या देश प्रदेश की राजनीति व नीति नियंताओं शासन प्रशासन पुलिस से यह यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि तमाम जातियों धर्मो के दुर्दांत अपराधियों और ब्राह्मण अपराधियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही में फर्क नजर आए ऐसी स्थिति का निर्माण ही क्यों किया जाता है ? मै इसको ठीक से समझने और समझाने के लिए लिख रहा हूं कि विकास दुबे व उसका गिरोह निसंदेह मौत के घाट उतारे जाने के लायक था पर क्या यह सवाल नहीं उठता कि एक हफ्ते की व्याहता को जेल क्यों भेज दिया गया ? क्या यह सवाल नहीं उठता कि विकास दुबे के नाबालिग पुत्र में ऐसा क्या खतरा था।

कि उसे कांच के टुकड़ों पर घुटनों के बल बैठाया गया ? विकास दुबे के असक्त व बीमार पिता को पेड़ के नीचे बैठाना कितना उचित था ? विकास दुबे की अपराध व जयराम की कमाई से बना घर गिराना तो समझ आता है पर उसके पुरखों का पुश्तैनी मकान गिरा कर पूरे परिवार को बेघर करना कितना उचित था ?।

विकास दुबे की गाड़ियां अपराध का हिस्सा थी उनको तोड़ना समझ आता है पर कृषि यंत्र व ट्रैक्टरों पर ताकत दिखाना कितना उचित था ? 

        आज यह सवाल उठ रहे हैं तो उसके पीछे और भी कारण हैं।अभी कुछ दिन पहले प्रयागराज के एक दुर्दांत अपराधी जो वर्षों से फरार व इनामी था।उसे पुलिस ने बड़े प्यार से गिरफ्तार किया व अनुकूल समय आने तक जेल से ही अपना कारोबार चलाने के लिए जेल भेज कर सुरक्षित कर दिया,उसकी गाड़ी क्यों नहीं पलटी ?

तमाम दुर्दांत अपराधी जिनकी गाड़ियां अब तक पंचर या पलट जानी चाहिए थी वो जेलों में आराम फरमा रहे हैं और वहीं से अपने अपराध साम्राज्य का संचालन कर रहे हैं,यद्यपि की सरकार कुछ कर रही है पर परिणाम तब तक नहीं आएगा जब तक मशीनरी उतनी ही प्रभावी कार्रवाई नहीं करेगी जितनी विकास के साथ किया है।

हर कोई जानता है जब तक अपराधी का ताल मेल पुलिस के साथ रहता है तब तक सब चलता है अगर विकास ने पुलिस से पंगा न लिया होता तो उसका जयराम बदस्तूर जारी रहता और जिंदा रहकर जेल से भी अपना कारोबार चलाता रहता सच तो यह है कि विकास का काउंटर जनता की रक्षा के लिए नहीं पुलिस के बदले के लिए किया गया।

और जो कारण है उसको समझने के लिए एक बात का उल्लेख करना चाहता हूं मेरे एक सजातीय प्रतापगढ़ी मित्र ने टिप्पणी की है कि भैया प्रतापगढ़ में एक व्यक्ति ऐसे हैं जिनके संरक्षण में विकास जैसे 100 अपराधी पलते हैं पर वो......सच में विकास की मौत पर ब्राह्मणों के अनुचित गुस्से का बीज राजनीति ने बोया है।

आज ब्राह्मण समाज को यह लगने लगा है कि सभी राजनीतिक दलों की सोच विकृत हो गई है और उन्हें लगता है कि सवर्ण खास कर ब्राह्मण को जितना सताया जाएगा उपेक्षित किया जाएगा उतना ही अन्य जातियों वर्गों को अपने पक्ष में गोल बन्द करके राजनीतिक सफलता प्राप्त करना आसान होगा ।

      उपरोक्त परिस्थिति ऐसे प्रश्न वाचक लगाती हैं जिनका समय रहते इस देश की राजनीति ने उत्तर न ढूढा तो जातीय उपेक्षा का गुस्सा सामाजिक सौहार्द के लिए ज्वाला मुखी विस्फोट करेगा मुझे इस बात की चिंता व डर है ,मै फिर दावे के साथ कह सकता हूं विकास दुबे से किसी ब्राह्मण को सहानुभूति नहीं है।

जब उसके माता पिता बड़े मन से कह सकते है कि विकास के साथ सही हुआ तो अन्य ब्राह्मणों को उससे सहानुभूति क्यों होगी ? पर यह जिम्मेदार व्यवस्था समझे कि उसके परिवार व ब्राह्मण समाज के साथ जो हो रहा है क्या वो सही है ?अपराधी केवल अपराधी होता है वो किसी का नहीं होता सरकार व शासन सब का होता है कुछ एक का नहीं होता

यह समाज को भी व्यवस्था को भी समझना होगा।भाजपा के पूर्व जिला महामंत्री राजेन्द्र पाण्डेय के विचारों तथा समाज के ताने बाने और वर्तमान सोशल मीडिया में मची उथल पुथल को उल्लेखित किया है।नीति नियंता को वर्तमान परिस्थितियों से उपजी सरकार की कार्यप्रणाली पर ब्राह्मण समाज संशकित निगाह से देख रहे है समय रहते समाधान व हल निकालना होगा।

दिनेश तिवारी